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कांग्रेस पर कमजोर हो रही गांधी परिवार की पकड़, असंतुष्ट हो सकते हैं मुखर


नई दिल्ली. जितिन प्रसाद के भारतीय जनता पार्टी में जाने के बाद कांग्रेस (Congress) हाईकमान को चिट्ठी लिखने वालों की संख्या घट कर 22 हो गई है. हाल ही में इन नेताओं ने बैठक की जिसमें इस मुद्दे पर आम सहमति बनती दिखी कि मौजूदा नेतृत्व पार्टी में जान फूंकने में अक्षम है. इसकी वजह यह नहीं कि गांधी परिवार के हाथ में पार्टी की कमान नहीं या उनका कोई सदस्य किसी अहम पद नहीं, क्योंकि ज्यादातर फैसले तो राहुल गांधी ही लेते दिखते हैं.

पंजाब और कांग्रेस की मौजूदा हालत देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि जब लीडरशिप कमजोर हो तो परिस्थितियां कैसी बन जाती हैं. दल में नेता की ताकत तभी तक होती है जब तक वह चुनाव जीतता है. सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) की अगुआई में कांग्रेस नीत यूपीए 10 साल तक सत्ता में थी और पार्टी में उनकी पकड़ मजबूत थी क्योंकि गठबंधन की जीत का सेहरा उनके सिर सजता था. लेकिन जब पार्टी की कमान राहुल गांधी के पास आई तो नेतृत्व की पार्टी पर पकड़ कमजोर हो गई. ऐसा इसलिए भी हुआ क्योंकि कई पुराने नेताओं ने उनकी बात सुनने से इनकार कर दिया.

पार्टी दो लोकसभा चुनाव हारी और राज्यों के चुनाव में भी उसे असफलता का सामना करना पड़ा. केरल में जहां हर पांच साल बाद कांग्रेस नीत गठबंधन की सरकार आती थी वहां भी इस बार ऐसा नहीं हुआ जबकि राहुल खुद यहां से सांसद हैं.

जी-22 कोविड की दूसरी लहर के चलते था चुप!सूत्रों का कहना है कि  जी-22 कोविड की दूसरी लहर और इसके हुए कहर को देखते हुए शीर्ष नेतृत्व को समय देने को तैयार था. लेकिन जैसे-जैसे चीजें बेहतर हुईं, वे इस बात को कहने से खुद को रोक नहीं सके कि कांग्रेस नेतृत्व को परवाह नहीं है. कपिल सिब्बल ने News18.com से कहा, ‘मैं अपनी आवाज उठाता रहूंगा. नेतृत्व तभी आगे बढ़ सकता है, जब वह सुनेगा.’ उन्होंने कुछ पत्रकारों से कहा कि चुनावी नुकसान का पता लगाने के लिए समितियों का गठन करना ठीक है, लेकिन समितियों को रिजल्ट भी देना चाहिए. एक महीना हो गया, ना कोई रिजल्ट है और ना ही कोई बदलाव किया गया.

सूत्रों का कहना है कि अब जी-22 का सब्र खत्म हो रहा है और अब विरोध की आवाजें और मुखर होंगी. ऐसे ही एक सदस्य ने News18.com को बताया, ‘हमारे पास खोने के लिए कुछ नहीं है. हमें कोई पद नहीं चाहिए, हम बस यही उम्मीद करते हैं कि कांग्रेस मजबूत हो लेकिन इसे मजबूत करने का कोई प्रयास होता नहीं दिख रहा है. हम कभी बीजेपी में शामिल नहीं होंगे लेकिन हम क्या कर सकते हैं? हम असहाय होकर कैसे देख सकते हैं?’

राजस्थान और पंजाब के संकट से साफ दिख रही लाचारी

गांधी परिवार की लाचारी राजस्थान और पंजाब के संकट से साफ दिख रही है. 10 महीने पहले जब सचिन पायलट और उनके समर्थकों ने विद्रोह किया तो गांधी परिवार बीच में आया और पायलट और समर्थकों को रोका. लेकिन गहलोत सरकार ने उस वक्त से अब तक कैबिनेट में फेरबदल करने या पायलट समर्थकों को साथ लेकर बोर्ड और आयोग के पदों भरने का कोई प्रयास नहीं किया. सूत्रों का कहना है कि केंद्रीय नेतृत्व द्वारा गहलोत को बार-बार याद दिलाने का कोई नतीजा नहीं निकला. कमजोर गांधी परिवार गहलोत पर ज्यादा दबाव नहीं डाल सका. माना जा रहा है कि गहलोत को गांधी परिवार की नहीं बल्कि गांधी परिवार को गहलोत की जरूरत है.

जब आप चुनाव हार जाएं और एक ऐसा नेता ना रह जाएं जो चुनाव ना जिता सके तो राज्य के क्षत्रप अपनी मनमानी करने ही लगते हैं. वह अपनी ताकत दिखाते हैं. सोनिया गांधी ने फोन कर के गहलोत को पायलट से संपर्क करने का प्रयास करने की अपील की. गहलोत ने आखिरकार अपने कुछ मंत्रियों के रिपोर्ट कार्ड मांगे ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि नॉन परफॉर्मिंग नेताओं को बाहर का दरवाजा दिखाया गया है और पायलट के कुछ सहयोगियों को मंत्रिमंडल में लाया गया है.

पंजाब में क्या हो रहा है?

दूसरी ओर गहलोत यह जानते हैं कि भले ही पायलट के सहयोगी उनके मंत्रिमंडल में शामिल हों लेकिन समय के साथ वह पायलट को सीएम बनाए जाने पर जोर देंगे. गांधी परिवार के लिए बातचीत करना मुश्किल हो सकता है क्योंकि गहलोत अब दो महीने के क्वारंटीन में चले गए हैं, इसका साफ मतलब है कि वह अपने विरोधियों और गांधी परिवार के दायरे से दूर चले गए हैं.

अब बात पंजाब की करें तो दिल्ली में नेताओं को इकट्ठा कर के कैप्टन अमरिंदर सिंह की स्थिति को कुछ हद तक कमजोर किया गया है. पंजाब के मुख्यमंत्री के खिलाफ कई शिकायतें की गई हैं, लेकिन गांधी परिवार उन पर कोई लगाम नहीं लगा पाया. इससे साफ दिख रहा है कि कई कैप्टन के खिलाफ मुखर आवाज के बाद भी गांधी परिवार उनके सामने कमजोर है. पंजाब को लेकर एक फार्मूला बनाया गया है. इसके अनुसार राज्य में दो डिप्टी सीएम होंगे जिसमें से एक नवजोत सिद्धू हो सकते हैं. लेकिन यह स्पष्ट है कि दो डिप्टी सीएम के साथ, सिद्धू  नंबर 2 नहीं होंगे. माना जा रहा है कि कांग्रेस की पंजाब इकाई का मुखिया भी अमरिंदर की पसंद का होगा.

राजस्थान में गहलोत और पंजाब में कैप्टन का कड़ा रुख गांधी परिवार की कमजोरी को दर्शाता है. यही मुद्दा जी 22 ने अपनी हालिया बैठक में उठाया. लेकिन सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह इस सवाल का जवाब नहीं दे पाए कि अगर गांधी नहीं तो फिर कौन? इस बात की आशंका भी जताई जा रही है कि टीएमसी नेता ममता बनर्जी, गैर-कांग्रेसी और गैर-भाजपाई नेताओं से मुलाकात कर के कांग्रेस की हालत और कमजोर कर सकती हैं.





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