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दिल्ली के लॉकडाउन से मुश्किल, घर लौट रहे प्रवासी मजदूरों का छलक रहा दर्द


दिल्ली में लॉकडाउन लगने के बाद प्रवासी मजदूरों की जिंदगी एक बार फिर मुश्किल में है.

दिल्ली में लॉकडाउन लगने के बाद प्रवासी मजदूरों की जिंदगी एक बार फिर मुश्किल में है.

दिल्ली में लॉकडाउन लगने के बाद प्रवासी मजदूरों की जिंदगी एक बार फिर मुश्किल में है. फैक्ट्री मालिकों ने हाथ खड़े कर दिए. ऐसे में उनको अपने घर बिहार लौटने के सिवा कोई दूसरा रास्ता नहीं सूझ रहा. हजारों प्रवासी मजदूरों की एक जैसी कहानियां उनकी परेशानियां बयां करती हैं.

नई दिल्ली. दिल्ली में 6 दिनों के मिनी-लॉकडाउन लगने के बाद एक बार फिर प्रवासी मजदूरों की जिंदगी मुश्किल में है. बिहार के गया के रहने वाले बब्बन यादव मंगलवार सुबह -सुबह आनंद विहार पहुंच गए. दिल्ली में नौकरी कर अपना और अपने परिवार का भरण-पोषण करने वाले बब्बन यादव को लाकडाउन के बाद अब यहां रहने में परेशानी परेशानी दिख रही है. क्योंकि इनके मालिक ने अब हाथ खड़े कर दिए हैं. इनके मालिक ने साफ कह दिया है कि हमारी तरफ से कुछ नहीं मिलेगा, इसीलिए इनको लगता है कि दिल्ली में बैठने से बेहतर है अपने घर गया चले जाएं.

न्यूज़ 18 से बात करते हुए बब्बन यादव कहते हैं, ‘दिल्ली में पेड बोतल वाला काम करते हैं. फ्रीज बोतल बनाते हैं. हम कारीगर हैं. दिल्ली में अकेले रहते हैं.’ अपनी आमदनी और अपने परिवार का जिक्र करते हुए बब्बन यादव कहते हैं, प्रति माह 17000 रुपए हमें मिल जाते हैं, रहने के लिए मालिक देता है. इसलिए 14-15 हजार रुपए प्रति महीना बच जाता है. वे कहते हैं, लेकिन इस मुसीबत में घर जाना पड़ गया. मालिक ने जब हाथ खड़ा कर दिए तो क्या करें ? यहां बैठने से तो कोई गुंजाइश है नहीं. घर में दो बच्चे हैं. उन्हें भी देखना है.

ये कहानी सिर्फ बब्बन यादव की नहीं है, बल्कि ये हाल बिहार समेत दूसरे प्रदेशों से आए हुए उन लाखों मजदूरों और कारीगरों की है जो दो-जून की रोटी की तलाश में दिल्ली और आसपास के इलाकों का रुख करते हैं. दिल्ली में रहकर ये लोग कम पैसे में अपना खर्च चलाकर अपनी कमाई का अधिकतर हिस्सा अपने घरों में भेजते हैं.

बिहार के दरभंगा के रहने वाले अर्जुन पांडे की भी यही हालत है. अर्जुन दरभंगा जिले के कमतौल थाना के मुरैठा गांव के हैं. दिल्ली से सटे नोएडा के सेक्टर 41 के पास आगाहपुर  में अर्जुन अपने पिता के साथ रहते हैं. दो भाइयों और चार बहन में अर्जुन सबसे बड़ा है. पिता के साथ-साथ पूरे परिवार को आगे बढ़ाने और चलाने की जिम्मेदारी अर्जुन के ऊपर है.अर्जुन कहते हैं कि 4 बहनों में 2 बहन की शादी हो चुकी है. दो की अभी बाक़ी है. यहां डाइंग लाइन में काम कर हमलोग पैसा कमाते हैं. मुझे 8500 रुपए जबकि पिता को 9500 रुपए प्रति माह मिलता है. लेकिन लॉकडाउन के डर से वापस जा रहे हैं. अर्जुन का कहना है कि कोरोना के डर से काम कम हो गया है. ऊपर से लॉकडाउन कभी हो सकता है. क्योंकि, दिल्ली में जब लग गया है तो नोएडा में भी अब लग जाएगा.

बिहार से दिल्ली और आस-पास के इलाकों में रोजगार की तलाश में आए लोगों के अलावा छात्र भी परेशान हैं. उनका कालेज और पीजी बंद हो गाया है. ऐसे हालात में उन्हें दिल्ली-नोएडा से बेहतर अपना घर ही लग रहा है. मोतिहारी के मधुबन के रहने वाले कमलेश कुमार मोतिहारी जिले के मधुबन प्रखंड के रहने वाले कमलेश कुमार ग्रेटर नोएडा में एक संस्थान से बी.फार्मा का कोर्स कर रहे हैं. अपनी परेशानी बताते हुए कमलेश कुमार आनंद विहार में बस के लिए भटकते दिखे. कोरोना की दूसरी लहर और उसके बाद दिल्ली में लॉकडाउन ने प्रवासी लोगों को परेशान कर दिया है. आनंद विहार में बस से अपने घर जाने के लिए आए लोगों की भीड़ से उनकी परेशानी साफ झलकती है.









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