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19 सालों से हिंदू मंदिर में पूजा कर रहे हैं कासिम साहिब, मस्जिद जाना छोड़ा


कासिम साहिब ने मंदिर में जिस दिन से पूजा करना शुरू की है, तब से ही मांसाहार छोड़ दिया है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Shutterstock)

कासिम साहिब ने मंदिर में जिस दिन से पूजा करना शुरू की है, तब से ही मांसाहार छोड़ दिया है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Shutterstock)

कासिम साहिब (Qasim Sahib) अपनी परेशानियों को लेकर पुजारी के पास पहुंचे, तो उन्हें कोरगज्जा (Koragajja) का मंदिर बनाने की सलाह दी गई. उन्होंने जमीन के छोटे से टुकड़े पर मंदिर बनाया. यह मंदिर बालकुंज पंचायत के अंतर्गत आने वाले कावाथरू में है.

मंगलुरु. केरल के 65 साल के कासिम साहिब ने दक्षिण कन्नड़ जिले में सांप्रदायिक सद्भावना (Communal Harmony) की एक शानदार मिसाल पेश कर रहे हैं. उन्होंने कोरगज्जा के मंदिर का निर्माण कराया है. इतना ही नहीं वे बीते 19 सालों से लगातार वहां विशेष और नियमित पूजा कर रहे हैं. हर रोज मंदिर में करीब 50 भक्त पहुंचते हैं. वे साहिब के पास पहुंचकर अपनी परेशानियां भी सुनाते हैं. इतना ही नहीं उन्होंने मंदिर में जिस दिन से पूजा करना शुरू की है, तब से ही मांसाहार छोड़ दिया है.

टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के अनुसार, केरल के पल्लकड़ जिले के चित्तालंचेरी गांव के कासिम साहिब करीब 35 साल पहले परिवार के साथ नौकरी की तलाश में कर्नाटक आए थे. यहां आने के बाद वे कावाथरू में बस गए. यह इलाका मंगलुरु से 40 किमी की दूरी पर है. एक समय ऐसा आया था, जब उनका परिवार बुरे दौर से गुजर रहा था. इसके बाद जब वे अपनी परेशानियों को लेकर पुजारी के पास पहुंचे, तो उन्हें कोरगज्जा का मंदिर बनाने की सलाह दी गई. उन्होंने जमीन के छोटे से टुकड़े पर मंदिर बनाया. यह मंदिर बालकुंज पंचायत के अंतर्गत आने वाले कावाथरू में है.

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साहिब के बनाए इस मंदिर में कोरागती की मूर्ति और साथ में दुर्गापर्मेश्वरी का मंदिर भी है. मंदिर में हर दूसरे वर्ष कोलोत्सव मनाया जाता है. इस गांव की आबादी 1500 है. गांव में रहने वाले हर धर्म और जाति के लोग मंदिर पहुंचते हैं. परेशानी बताने वाले भक्तों को साहिब कोरगज्जा के प्रसाद के तौर पर चंदन का लेप देते हैं.

वे बताते हैं ’35 साल पहले ग्राम पंचायत की तरफ से आवंटित जमीन पर घर बनाने के बाद मुझे कुछ परेशानियों का सामना करना पड़ा. गांव के दर्शन पात्री ने कहा कि मेरे घर के पास पहले कोरगज्जा की पूजा होती थी. इसलिए मैंने कोरगज्जा और दूसरे देवों की पूजा शुरू करने का फैसला किया.’ वे कहते हैं ‘मेरे बच्चे मस्जिद जाते हैं और वे कोरगज्जा और दूसरे हिंदू देवी-देवताओं को भी मानते हैं. मैंने मस्जिद जाना छोड़ दिया, क्योंकि मुझे कोरगज्जा के दर्शन मिले थे.’









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