Breaking News

Hindi journalism the expectation of Corona era | हिंदी पत्रकारिता: कोरोना काल की उम्मीद | – News in Hindi

अंतहीन सी दिखाई देती इस महामारी के दरमियान एक उम्मीद बतौर हिंदी अख़बारों में गहरा परिवर्तन देखने को मिला है. पिछले दशकों से अनेक हिंदी अख़बार सत्ताधारी पार्टी के समक्ष समर्पण करते आए हैं. हालांकि अब अंग्रेजी का अख़बार भी अक्सर आँगन लीप रहा है, लेकिन अख़बार का पतन राम जन्मभूमि आंदोलन के दौरान शुरु हुआ था जब कई प्रमुख हिंदी अख़बार विकट साम्प्रदायिक हो गए थे. पिछले डेढ़ महीने में लेकिन हिंदी अख़बारों की नई रंगत चमक कर आई है. इन अख़बारों ने डंके की चोट पर सत्ता पर प्रहार किया है, इनकी ज़मीनी ख़बरों ने कई अवसरों पर अंग्रेजी पत्रकारिता को पीछे छोड़ दिया है. कई हिंदी अख़बारों ने अपनी रिपोर्टिंग से चकित कर दिया है. इनकी कई खबरें ऐसी हैं जो किसी एक संवाददाता के बजाय बीसेक़ कलमों से उपजी हैं, यानी अचूक सम्पादकीय दृष्टि को बतलाती हैं. मसलन गंगा में बहती लाशों पर ‘दैनिक भास्कर’ की सत्ताईस ज़िलों से एकत्र की गई खबर. भोपाल के श्मसान घाट, लखनऊ में मृत्यु प्रमाणपत्र की बढ़ती मांग, छत्तीसगढ़ के धमतरी ज़िले में रातों रात कम दिखाए गए कोरोना पीड़ित, उत्तर प्रदेश और बिहार की ग्रामीण स्थिति – पिछले डेढ़ महीने में हिंदी प्रदेश से आ रही लगभग हरेक प्रमुख ज़मीनी खबर हिंदी पत्रकार की है. अंग्रेजी की पत्रकारिता अक्सर इन्हीं ख़बरों को अपना आधार बना रही है. अंग्रेजी पत्रकार इन ख़बरों को बेहिसाब उद्धृत कर रहे हैं। हिंदी अख़बार की यही पहुंच उसे अंग्रेजी अख़बार पर अविजित बढ़त दिला देती है. तीस ज़िलों से खबर एकत्र करने के लिए हिंदी अख़बारों को सिर्फ़ एकदो दिन चाहिए क्योंकि उनके संवाददाता प्रायः हरेक ज़िले में मौजूद हैं, जबकि इतनी सामग्री जुटाने के लिए राजधानी में केंद्रित अंग्रेजी के पत्रकार को कई दिनों तक घूमना पड़ेगा. यह परिवर्तन पत्रकारिता के साथ समूचे हिंदी समाज के लिए भी आश्वस्तिदायक है. अगर हिंदी मीडिया अपने दर्प और गरिमा के साथ दमकेगी, हिंदी प्रदेश की राजनीति को चुनौती देगी, हिंदी समाज के भीतर पैठी जड़ता दूर होगी. अंग्रेजी के प्रति मोह मिटेगा। हिंदी-भाषी पत्रकार को वह व्यापक सम्मान वापस मिल सकेगा जो उसे कभी ‘धर्मयुग’, ‘दिनमान’ और ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ के समय मिला करता था. बस्तर में मृत्यु मुझे ऐसा कोई अवसर नहीं याद आता जब किसी की पिता और बेटे दोनों से दोस्ती रही हो, कुछ बरसों के अंतराल में उसने पिता और बेटे दोनों को जाते देखा हो और पिता के बाद अब बेटे पर लिख रहा हो. एक ऐसा पिता जिसे गए ठीक आठ साल हुए लेकिन जिसका साया आज भी बस्तर के आकाश मंडराता है, जिसके बग़ैर बस्तर के नक्सल आंदोलन की कथा अधूरी रहेगी. एक ऐसा बेटा जो अपने पिता जितना सामर्थ्यवान और मशहूर तो क़तई नहीं था, लेकिन निर्भीक शायद उतना ही था. अपने कुटुम्ब के कई अन्य सदस्यों की तरह मृत्यु का भय जन्म लेने से पहले ही कहीं दफ़ना आया था. मेरी दीपक कर्मा से दोस्ती उनके पिता महेंद्र कर्मा की नक्सलियों के हाथों हत्या के बाद शुरु हुई थीं. महेंद्र कर्मा नब्बे के दशक से बस्तर में नक्सलियों से लड़ रहे थे. वे बस्तर से नक्सलियों को हटाना चाहते थे, सलवा जुड़ुम आंदोलन चलाया था, लड़कों को बंदूक़ें थमा दी थीं और न जाने कितने आदिवासियों की हत्या में भागीदार हुए थे. उन पर कई बार हमले हुए थे, और आख़िर में मई दो हज़ार तेरह में नक्सलियों ने अपने सबसे बड़े शत्रु को मिटा दिया.ठीक आठ साल बाद इस मई के महीने में उनका बड़ा बेटा दीपक कर्मा कोरोना वायरस से हार गया. अपने लड़कपन से बन्दूकों और राइफ़लों के साथ जीता आया दीपक कर्मा, अपने परिवार का शायद सबसे सयाना सदस्य, कर्मा परिवार का एकमात्र सदस्य जिसने मुझसे कई बार कहा कि सलवा जुड़ुम ठीक रास्ते पर नहीं गया, उस युवक को कोरोना ने मिटा दिया. मृत्यु का यह दौर मानव इतिहास में शायद अतुलनीय है. आप परिवार जोड़ते हैं, अपना जीवन इस परिवार के लिए समर्पित करते हैं कि अकेले न मरना पड़े. लेकिन आज हम एक क्रूर और निर्वासित एकांत में मर रहे हैं, अपने मृतक के पास जा भी नहीं सकते. यह अस्पृश्य मृत्यु है, जिसके साथ पछतावे भी बेशुमार जुड़ जाते हैं. पंद्रह दिन पहले मेरे पास ट्विटर पर सुबह छह बजे करीब किसी अनजान व्यक्ति का मैसेज आता है कि उनके रिश्तेदार बहुत बीमार हैं, क्या ऑक्सीजन सिलेंडर की व्यवस्था हो सकती है. मैं इस मैसेज को क़रीब पौने नौ पर देख पाता हूं. उनसे मरीज़ का नाम, पता इत्यादि पूछता हूं. उनका तुरंत जवाब आता है कि वे अब नहीं रहे. ग्लानि से भरा मैं तुरंत माफ़ी मांगता हूँ कि उनका मैसेज देर से देख पाया. इसी तरह ग्यारह मई की रात किसी का वाट्स एप्प मैसेज आता है कि एक वृद्ध महिला कोविड अस्पताल में भर्ती हैं, डॉक्टर ने कहा है कि उन्हें आईसीयू में भर्ती करना है – क्या हो पाएगा? मैं कुछ फ़ोन घुमाता हूं।एक जगह से जवाब आता है कि मरीज़ का विवरण भेजें. मैं मरीज़ के रिश्तेदार को फ़ोन करता हूं. उनका जवाब आता है कि तुरंत विवरण भेज रहे हैं. पांच मिनट बाद उनका मैसेज आता है – वह नहीं रहीं. इस मृत्युकाल के बाद बचे रह जाना एक पछतावे जैसा एहसास बन जाएगा. (डिस्क्लेमर: यह लेखक के निजी विचार हैं.) ब्लॉगर के बारे में आशुतोष भारद्वाजलेखक, पत्रकार गद्य की अनेक विधाओं में लिख रहे गल्पकार -पत्रकार-आलोचक आशुतोष भारद्वाज का एक कहानी संग्रह, एक आलोचना पुस्तक, संस्मरण, डायरियां इत्यादि Continue Reading